बिहार विधानसभा चुनाव में एनडीए ने ऐतिहासिक जीत दर्ज कर सभी राजनीतिक विश्लेषकों को चौंका दिया है। इस बार एनडीए ने पिछले चुनाव से 80 से अधिक सीटें ज्यादा अपने खाते में डालीं, जिससे नीतीश कुमार, भाजपा, एलजेपी और अन्य सहयोगी दलों की साझा सरकार बनाने की राह आसान हो गई है। वर्तमान में मंत्रिमंडल गठन की तैयारियां लगातार चल रही हैं।
वहीं दूसरी ओर, बिहार में पांच सीटें जीतने वाले असदुद्दीन ओवैसी की ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) पार्टी ने भी सरकार बनाने का सपना देखा है। AIMIM ने जेडीयू, राजद, कांग्रेस, आईएमआईएम, सीपीआईएमएल और सीपीआईएम को मिला कर सरकार बनाने का प्रस्ताव दिया है। दल के आधिकारिक एक्स हैंडल पर ट्वीट किया गया, “अभी भी सरकार बनाने का मौका है।”
अगर आंकड़ों की बात करें, तो जेडीयू के पास 85, आरजेडी के पास 25, कांग्रेस के पास 6, AIMIM के पास 5 और CPI-ML, CPI-M के पास क्रमशः 3-3 सीटें हैं। इनका कुल योग 124 होता है, जो राज्य की सरकार गठन के लिए जरूरी 122 सीटों से 2 अधिक है।
AIMIM ने अपने प्रस्ताव में कहा कि अगर गठबंधन बनता है तो मुख्यमंत्री उनका होगा, जेडीयू के कोटे से दो डिप्टी सीएम और 20 मंत्री, राजद को 6, कांग्रेस को 2 और CPI-ML व CPI-M को एक-एक मंत्री पद मिल सकता है। साथ ही, ओवैसी ने बयान दिया कि 2029 में नीतीश कुमार को प्रधानमंत्री उम्मीदवार बनाया जा सकता है। AIMIM का दावा है, “हम जोड़ने की राजनीति करते हैं, तोड़ने की नहीं।”
सीमांचल क्षेत्र में AIMIM का खास प्रभाव है, जिसने कुल 243 सीटों में से 29 पर चुनाव लड़ा था, जिसमें से 24 सीमा क्षेत्र की थीं। जानकार मानते हैं कि मुस्लिम वोटों के बिखराव की वजह से ही राजद और कांग्रेस को कई सीटों पर नुकसान उठाना पड़ा। चुनाव से पहले AIMIM ने महागठबंधन में शामिल होने की कोशिश की थी, लेकिन जब प्रस्ताव ठुकरा दिया गया तो उन्होंने अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया।
इस चुनावी समीकरण से साफ है कि बिहार की राजनीति अभी कई नए समीकरणों के दौर से गुजर रही है और आगे भी विचार-विमर्श, गठबंधन और राजनीतिक जोड़तोड़ की चर्चाएं तेज रहेंगी।